Atul’s Song A Day- A choice collection of Hindi Film & Non-Film Songs

Aanewaala hai din qayaamat ka

Posted on: December 26, 2019


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Mohammed Rafi : The incomparable (II) – Song No. 15
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It is very much true even today that the title of ‘Sone ki chidiya” suits India very well. This guileless person, named Mohammad Rafi is one of the genuine golden feathers of this ‘Sone ki Chidiya”

“Sona” in material terms as we all know is Gold, as in precious metal. And in our country traditionally and religiously Gold is treated as Goddess Laxmi. Other cultures in the world treat it as a precious metal and metal alone. But we in india have been revering “Gold” as much more than a costly metal. It is equated with wealth and prosperity. If a percentage of the country’s household are super rich, a bigger percentage of households are comprising of the so called middle classes and all of these people have amassed gold reserves in the families. I have seen women, mostly housewives saving up to buy gold jewelry. My own mother used to save up to years, so that she could get some small gold jewellery pieces. My mother’s savings habit has saved many a rainy day, if we believe the stories she tells of this event or that event. Many times the relatives will be in trouble and some or the other need will arise in the household and her savings or even gold jewellery was the only thing to be cashed.

It boggles the imagination to ascertain the quantum of gold stashed away in small or minute holdings even, over crores of households. And most of it will hopefully be useful in their hours of need. If a small token of wealth is not useful in saving a life or a way of paying a child’s school fees, than it is not ‘laxmi’, not really.

Southern India and it’s cultural make up is famous for flaunting its obsession with gold. Temples and shrines all over the country are reportedly laden with gold and jewelry, naturally donated by the devotees.

Since ancient times, the regions of present day india were part of the larger region broadly known as ‘Hind’ or ‘Hindustan’. This region is sometimes described as ‘sone ki chidiya’ in legends and ‘daastaan’. By now even if it has broken into many pieces and fragments, with conflict and strife spread over the whole region, with malice towards one and all, inside these fragmented nation states and elsewhere, it is worth reminding ourselves of the history and cultural heritage of our ancestors. A sense of preservation needs to prevail in our collective deeds, if this flourishing civilized society, invaded for centuries on end, and yet surviving all trials and tribulations, because of its thinkers, philosophers, poets, musicians and sant mahatma’s, is to continue the journey into eternity. Languages, arts and cultural values and music has always been the backbone of this heritage.

Some months ago I had written one article in hindi titled “sone ki chidiya” for the office magazine. I am including that article here for the readers benefit and contemplation.

– सोने की चिड़िया –
मकानी हूँ के आज़ाद –ए-मकां हूँ
जहां में हूँ के ख़ुद सारा जहाँ हूँ
वो अपनी लामकानी में रहें मस्त
मुझे इतना बता दें मैं कहाँ हूँ
कुछ दिन पहले मैं अपनी बहन के साथ एक मॉल में गयी । वहाँ घूमते हुए और दुकानों की चकाचौंध देखते हुए अचानक मेरी बहन जो वर्षों से गल्फ में बसी है, कहने लगी की यह बात बहुत उपयुक्त है की यह देश पिछले दो से तीन सौ सालों में दोबारा से ‘सोने की चिड़िया’ बन गया।
प्राचीन काल में हमारा भारत देश सोने की चिड़िया के नाम से मशहूर था यह सब तो हम ने किताबों में बचपन से पढ़ा है। यही वजह थी की हजारों सालों से इस सर – ज़मीन पर विदेशी हुकमुरानों ने बार बार आक्रमण किए । कुछ लोगों ने लूट मार की तो कुछ लोगों ने यहां की तहजीब में रच बस कर इसे और निखारा और संवारा और इस धरती का ‘सोने की चिड़िया’ खिताब को सदियों से बने रहने में अपनी अपनी भूमिका निभाई।

यह भी सम्झना आवश्यक है की ये वो ज़माना था जब सब तरफ ‘ माइट इस राइट ‘ का चलन था , जो कोई भी अपनी भारी भरकम सेना ले कर किसी दूसरे के राज्य पे आक्रमण कर फतेह कर ले वो राज्य उस का हो गया । और इस तरह इस फतेह किए हुए राज्याओं पर राज्य बनाए रखने के लिए ‘फ़िज़िकल माइट’ का बहुत महत्व होता था ।

ऊपर मैंने आक्रमण करने वाले हुकमूरानों के संदर्भ में न चाहते हुए या यूं कहें की बड़ा हिचकिचाते हुए विदेशी शब्द का प्रयोग किया। उस काल में तो हर क्षेत्र के लोग अपने आस पास के इलाक़ो के बाहर हर जगह को विदेश ही समझते होंगे । जबकि यह देश और विदेश की कल्पना उन्नीसवी / बीसवीं सदी में ही जागृत हो कर पूरे विश्व में फैल गयी और एक प्रकार का विभाजन हुआ और अलग अलग ‘nation states’ का चलन चला, चल क्या निकला , पूरा विश्व छोटे छोटे टुकड़ों में बट गया। कहीं मज़हब, कहीं भाषा, कहीं संस्कृति तो कहीं कुछ और, हर एक मुल्क अपनी अपनी सीमाओं में बंद हो गया । यह कैसा सोचों का, विचारों को, नदियों का, हवाओं का, पहाड़ों का, खेतों का, शहराहों का, शहर-क़स्बों का, तंग घाटियों का, द्वीपों का, क़िस्से कहानियों का, गीतों और रागों का, और जाने क्या क्या कुछ….. बटवारा हो गया । साथ ही बंटवारा हुआ प्राकृतिक संसाधनों का और कुदरत की दी हुई बेशुमार नयमतों का । बट गईं मानवता की धार्णएं और 21वी सदी में तो ऐसा लगता है की यह धरनाएं सिर्फ किताबों में सीमित हैं। पिछले युग के राजे महाराजे अपनी ताक़त के बल बूते राज्य करते और आज भी नेशन स्टेट्स अपना ‘पॉलिटिकल माइट ‘ इस्तेमाल कर न सिर्फ स्टेट पर बल्कि दूसरे स्टेट्स की प्रकृतिक संसाधनों पर भी अपना नियंत्रण बनाते हैं और उसे बनाए रखने के लिए हर एक मानव्य/अमानव्य हत्यारों का इस्तेमाल करने से बिलकुल संकोच नहीं करते। और इसी से ज़मीर के साथ conflict वाली स्टीथि भी है की जो कोई कार्य या विचार धारणा मेरे लिए सही है तो वही सोच और धारणा दूसरे के लिए गलत है । मुझे नहीं लगता की इस सृष्टि की रचना का उद्देश्य यह होगा की मानविक समाज इस तरह देशों, प्रान्तों ,भाषाओं और इन सब के प्रेम की आड़ में अपने अपने अहंकारों की, आत्महित के दायरे में, और चक्रव्युह में फंस कर, एक दूसरे से सदैव संघर्ष और तुछ लड़ाईयाँ लड़ता रहे। क्यूंकी आज भी जब हम आपस के संघर्ष को , अपने नजरियों का दायरा बड़ा कर के देखें तो यह सब तुछ ही हैं।
आज मानवता पूरी तरह से बटी हुई है । यह वो मनुष्य जाति है जो इस ब्रह्माण्ड में ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है । सारी की सारी रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ होना क्या होता है ये शायद हम मनुष्यों को रास न आया।

ऐसी अंतर्राश्त्र्य अनुशासन तथा सामाजिक तंत्र के चलते किसी एक व्यक्ति, कोन्सोर्टिउम, कॉर्पोरेट, या व्यवस्था या कोई नेशन-स्टेट को सोने की चिड़िया बने रहने में जो मनव्य मूल्यों के त्याग की आवश्यकता थी वो तो हमारी अर्थव्यवस्था कर ही चुकी है और इस की मानवता ने भारी क़ीमत भी चुकाई है और चुका रहें हैं हम सब ही व्यक्तिगत सतह पर। सिर्फ यह है की इस क्षति का और उस के परिणामों का आभास कुछ ही लोग कर पा रहे हैं।

एक और अनुभव जो पिछले कुछ महीनों में मुझे छू गया , उस का विवरण यहाँ करना उपयुक्त है।

मैं मुंबईकर हूँ और यही पली बढ़ी होने के कारण मुझे यहाँ के विद्यालयों के प्रति लगाव है। मेरे माता पिता के बाकी परिवार के सभी लोग बेलगाम (कर्नाटक) में रचे बसे हैं और हर तरफ फैल गए हैं। मेरे छोटे मामा के बेटे ने कुछ वर्ष पूर्व बेलगाम से पढ़ाई पूरी की थी, और नेत्र विशेषज्ञ के रूप में केरल में प्रशिक्षण कर रहा है। मैं ने उसे फोन किया यह पुछने की मैं मेरे बेटे के लिए मुंबई के अलावा कौन से कॉलेज में प्रवेश को प्राथमिकता दूँ। सारी औपचारिकताएँ समाप्त होते ही मैं ने मुद्दे की बात छेड़ दी । मेरी सारी बात सुनते ही पहली बात जो मेरे ममेरे भाई ने कही वो यह थी की आप अपने बेटे को बेलगाम में क्यूँ नहीं दाखिला दिलाते? मैं इस प्रश्न को सुन परेशान हो उठी, की यह सवाल मेरे दिल-ओ-दिमाग में दूर दूर तक नहीं आया। मैं ने अपने लहजे के पूरे आश्चर्य को बिलकुल भी न छिपाते हुए कहा की मुंबई और महाराष्ट्र में इतने अच्छे और नामचीन कॉलेज के होते हुए भी मैं मेरे बेटे के लिए बेलगाम का कॉलेज क्यूँ चुनुंगी । पर वो तो बिलकुल भी प्रभावित न हुआ मेरी बात से और अपने बिन्दु पर टिका रहा और कहा “क्यूँ बेलगाम की जीएमसी तो कर्नाटक के चोटी के 3 कॉलेज में है अच्छे कॉलेज की शिक्षा से काफ़ी फर्क पड़ता है “ । मैं ने कहा की ऐसा होगा लेकिन जब मैं मुंबई निवासी हूँ और यहाँ के 5 में से 4 कॉलेज पूरे देश की किसी भी सूची में चोटी के पंद्रह या बीस के अंदर ही आती हैं तो बेलगाम के कॉलेज के बारे मुझे विचार की भी आवश्यकता नहीं लगती।

इतनी बातचित के बाद भी मेरा ममेरा भाई मेरे दृष्टिकोण को नहीं समझ पा रहा था, तो अंत में मैं ने उस से कह दिया के वो अपने मित्र मण्डल में जो की महाराष्ट्र में पढे हैं उन से सलाह कर के मुझे यहां के कॉलेज की आपस में श्रेणी की सही सही जानकारी दे दे ताकि मेरे बेटे को उस के श्रेणी के अनुकूल मुंबई या मुंबई के बाहर के कॉलेज में प्रवेश मिल सके।

इस वार्तालाप के बाद मैं सोच में पड़ गयी कि वो एक चिकित्सीय व्यवसायिक होने के बावजूद क्यूँ नहीं समझ पा रहा या मान रहा की मैं मुंबई में हूँ जो की हमारे देश की दूसरी बडी जगह है चिकित्सीय शिक्षा के लिए, दिल्ली के बाद । फिर जब सोच की इंतेहा पर समझ आया की वो तो उस का दृष्टिकोण था । ऐसा बिल्कुल नहीं था की वह मेरी बात समझने की क्षमता नहीं रखता । लेकिन यह दोष उसके दृष्टिकोण का था जो उस को उसकी सोच के दायरे से बाहर देखने ही नहीं देता। क्यूंकी वो खुद बेलगाम से हैं और पढ़ाई पूरी वही की और अब भी वहीं जा के बसने की कामना करता है, और उसे अपने शहर और कॉलेज के प्रति बहुत गर्व भी है । यह सब जब मेरे दिमाग में और यादों के पर्दों से बाहर आया, तो प्रतीत हुआ की उस का नज़रिया उस को रोक रहा था मेरे नजरिये को देखने से । उस की सोच की सीमा वहीं तक सीमित है और वो उस से आगे देख नहीं पा रहा।

यही काम तो है सीमाओं का जो की मानवता को बांधने में, इस की मानसिक रूप से मर्यादित करने में सफल हो गयी हैं। सोच की सीमाएं, चाह की सीमाएं, अनजानी चीजों को देखने परखने में संकोच और ऐसी सीमित करने वाली मानसिक पीड़ाओं से हमारा समाज और सामाजिक-तंत्र बंधा हुआ है। हर कोई अपनी सोच और अपने दृष्टिकोण के आगे, बाहर या आस पास और उस से दूर पनपने वाली बेहतर और उच्च चीजों या बातों को अपनी पहुँच से बाहर पता है। ऐसा क्यूँ है ?

और देखिये क्या कहते हैं अललमा इकबाल :

सितारों से आगे जहां और भी हैं ।
अभी इश्क़ के इम्तेहान और भी हैं ।
तिही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएं
येहां सैकड़ों कारवाँ और भी हैं ।
कनाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बु पर
चमन और भी हैं आशियाँ और भी हैं।
अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म
मुक़ामात-ए-आह-व-फुगाँ और भी हैं।
तू शाहीन है परवाज़ है तेरा काम
तेरे सामने आसमां और भी हैं ।
इसी रोज़-व-शब में उलझ कर न रेह जा
के तेरे ज़मान-व-मकां और भी हैं ।
गए दिन के तन्हा था मैं अंजुमन में
येहां अब मेरे राज़दान और भी हैं ।
***************

Also remembering this song :

jahaan daal par sone ki chidiya karti hai baseraa
woh bhaarat desh hai meraa

The Rafi song featured here is from the film ‘Johar in Kashmir’. The word ‘Johar’ means, a jewel or a gem and pearl. ‘jawahrat’ – is a word for collection of precious jewels, diamonds, pearls etc. ‘Johar’ also means talent or stupendous ability etc.

This song is written by Indeevar and composed by Kalyanji Anandji. The tune is reminding me of Jis ka koi nahin uska to Khuda hai yaaron from Laawaris.

Rafi sahab has rendered this song with his customary gusto. ‘Gusto’ is a word that Atulji used a lot in respect of Rafi songs years ago.

The message in the song is quite apparent. The I S Johar is the dervaish, giving sermons to all and sundry that the day of judgement is not far and none of the oppressors (those committing excesses on fellow beings) will be forgiven and allowed to go scot free.

Essentially what the dervaish is doing is trying to warn the oppressors to be afraid of God almighty and his wrath, ask for his forgiveness while there is still time. It is like trying to help the oppressors, by convincing them to stop the bad deeds and obtain forgiveness from the God Almighty.

Like this hadith:

Allah’s messenger (pbuh) said, ‘Help your brother, whether he is an oppressor or he is an oppressed one.”
People asked “O Allah’s Messenger! It is all right to help him if he is oppressed, but how should we help him if he is an oppressor?”
The Prophet said, “By preventing him from oppressing others.”

Video :

Song-Aanewaala hai din qayamat kaa… koi zaalim na bakhsha jaayegaa (Johar in Kashmir)(1966) Singer-Rafi, Lyrics-Indeewar, MD-Kalyanji Anandji

Lyrics

Begunaahon ka lahu hai
ye rang laayegaa
begunaahon ka lahu hai
ye rang laayegaa
daag daaman pe na aaya
to dil pe aayegaa
aanewaala hai din qayaamat kaa aa aa aa aa
koi zaalim na bakhsha jaayegaa
koi zaalim na bakhsha jaayegaa
begunaahon ka lahu hai
ye rang laayegaa

hamaare bhai huye ham na huye
karbala ke sitam to kam na huye
zulm duniya mein ab bhi zinda hai
aadmeeyat hai ke sharminda hai
aadmeeyat hai ke sharminda hai
maa shaheedon ki ab bhi roti hai
zulm ki hadd bhi koyi hoti hai
haqq paraston ko bhi na-haqq maara
haay dil gham se hai paara paara
haay dil gham se hai paara paara
yazid ki ho hukumat ya kisi zaalim ki
har ek zulm ka insaaf kiya jaayegaa
har ek zulm ka insaaf kiya jaayegaa
aanewaala hai din qayaamat kaa aa aa aa aa
koyi zaalim na bakhsha jaayegaa
begunaahon ka lahu hai
ye rang laayegaa

zarre zarre mein guzar rakkhta hai
sab ki harkat pe nazar rakkhta hai
nek aur bad chhupaa nahi uss se
khudaa to sab ki khabar rakkhtaa hai
khudaa to sab ki khabar rakkhtaa hai
meher pe aaye to gaffar bhi hai
qehar pe utre to jabbar bhi hai
yun to har deen se upar hai khudaa
qadmeeyat ka tarafdaar bhi hai
aadmeeyat ka tarafdaar bhi hai
sholey nafrat ki dilon mein
na tu bhadkaa zaalim
apni hi aag mein tu
aap hi jal jaayegaa
apni hi aag mein tu
aap hi jal jaayegaa
aanewaala hai din qayaamat kaa aa aa aa aa
koyi zaalim na bakhsha jaayegaa
begunaahon ka lahu hai
ye rang laayegaa

nahin kaafi hai musalmaan honaa
bas nahin hafiz-e-quraan honaa
Allah ta’alaa ka pyaar paane ko
laazmi hai teraa insaan hona
laazmi hai teraa insaan hona
amal to saathh tere ho le gaa
khoon to sar pe chadh ke bole gaa
khudaa mazhab hi na dekhegaa teraa
teri insaaiyat bhi toley gaa
teri insaaiyat bhi toley gaa
pyaar par rakkhi hai buniyaad har ek mazhab ki
koyi talwaar pe rakkhegaa to kya paayegaa
koyi talwaar pe rakkhegaa to kya paayegaa
aanewaala hai din qayamat kaa aa aa aaaa
koyi zaalim na bakhsha jaayegaa
begunaahon ka lahu hai
ye rang laayegaa

tu ne pyaason se Pyaale chheene
tu ne honton se niwaale chheene
tu ne sham’ean jalaayin qabron par
aur makaanon se ujaale chheene
aur makaanon se ujaale chheene
dilon mein farq iss qadar daale
tu ne dariyaa bhi khoon se bhar daale
ek dharti banaayi Allah ne
tu ne tukde hazaar kar daale
tu ne tukde hazaar kar daale
tunaah kartaa hai tu kis ke liye soch to le
thaali haathon hi tu tanhaa yehaan se jaayegaa
khaali haathon hi tu tanhaa yehaan se jaayegaa
aanewaala hai din qayamat kaa aa aa aaaa
koyi zaalim na bakhsha jaayegaa
begunaahon ka lahu hai
ye rang laayegaa

ye padosi se ladaayi kaisi
sabhi bhaai hain judaayi kaisi
ye tabaahi ki saari baaten hain
iss mein insaan ki bhalaayi kaisi
iss mein insaan ki bhalaayi kaisi
nek neeyat ko tu armaan kar le
aadmeeyat ko tu imaan kar le
yahi islaam ki naseehat hai
apne dil ko bhi musalmaan kar le
apne dil ko bhi musalmaan kar le
hadd se aage na tu badh waqt hai kar le taubaa
roz samjhaane ko darvesh nahin aayegaa
roz samjhaane ko darvesh nahin aayegaa
aanewaala hai din qayaamat kaa aa aa aa aa
koyi zaalim na bakhsha jaayegaa
begunaahon ka lahu hai
ye rang laayegaa
daag daaman pe na aaya
to dil pe aayegaa

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